वो सुंदरी…

मैं रंग रूप का मारा सा,
वो सुंदर सी इक काया सी,
इक नामुराद सी जान हूँ मैं,
वो अरमानों की छाया सी।

मैं घोर मलिन लोभ मोह,
वो कोमल कोई माया सी,
उसकी छवि “रब” का प्रकाश,
मैं “उसकी” मिट्टी ज़ाया सी।

सूरत उसकी मन का सुकूँ,
तस्वीर मेरी पराया सी,
मेरे चरित्र पर कोहरा चढ़ा,
उसकी मूरत नुमाया सी।

ये मरासिम…

ये जो जज़्बातों में बह कर,

राब्ता क़ायम किया था हमने,

इस मरासिम ने तुझको क्या दिया?

कुछ भी नहीं।

इस मरासिम ने मुझको क्या दिया?

कुछ भी नहीं।

पर हाँ, खुदगर्ज़ निकला ये राब्ता,

न तुझसे न मुझसे वफ़ा निभाई,

तुझसे तेरा सुकून ले गया,

मुझसे मेरी ज़िंदगी।

रूह का लिबास बदल लें…

ये रूह मेरी हर पल,
कहती है चल,
अब लिबास बदल लें,
कुछ एहसास बदल लें,
बदल लें लफ़्ज़ों के माने,
दूर और पास बदल लें।

और खुश रहने की वजहें,
किसी और की मुस्कान थी जो,
अब बेवजह ही मुस्कुराएं,
वो सूरत-ए-उदास बदल लें।

मौके कई दे दिए अब तलक,
यक़ीन का इम्तेहान भी बहुत हुआ,
इस बार खुद और ख़ुदा पर,
कुछ थोड़ा विश्वास बदल लें।

खुद ही का हमसफर अब,
खुद ही को बनाया जाए,
वो ख्वाइशों में कहीं दबा हुआ,
अगर और काश बदल लें।

मैं और तू के तर्क से दूर,
उस शजर की छावों में बैठें,
कुछ देर दम लेकर फिर,
कुछ ज़मीं, कुछ आकाश बदल लें।

इंतज़ाम सब है…

महफिलों से भरी गलियों में रहता हूँ,
जाम, इश्क़, यार, सर-ए-आम सब है।

तू बस एक बार आने की हामी तो भर,
मेरी जान, यहाँ इंतज़ाम सब है।

कोई यहाँ तुझे पहचान भी जाए तो डर नहीं,
मेहमान-ओ-मेज़बान-ओ-मकान, यहाँ बदनाम सब है।

तेरा मज़हब, मेरा खुदा, किसी का ज़िक्र नहीं,
यहाँ के काफिरों में ये हराम सब है।

तन्हाई का नाम-ओ-निशाँ नहीं यहाँ,
दिल-फेक आशिक़ मेहरबान सब है।

वो पल…

तेरी तस्वीर आज जब मेरे रूबरू हुई,
इक पल को वो बात याद आई,
जो तब तुझसे कहना रह गया,
न पलकें झपकाई, न होंठ हिले,
इक आखरी अक्स तेरा था जो आंखों में,
वो भी इस कतरे आँसू के साथ बह गया।

मैं तकता रहा तेरा चेहरा,
वो तेरे बाल, तेरे रुखसार,
और तेरी आँखों से छलकता प्यार,
मैंने बस वक़्त गँवा दिया लफ्ज़ चुनने में,
तू आया, मुस्कुराया, हाथ पकड़ा,
और अलग होने का अपना फरमान कह गया।

सब तो ख्वाब सा ही लगा उस पल,
इश्क़ कहाँ, बचपना था, शरारत थी,
फिर भी तेरे बिना ज़िन्दगी आफत थी,
मैं काफी देर तक उसी जगह खड़ा रहा,
तूने मुड़ के देखा नहीं पर,
वो कच्चा पक्का सा रेत का महल तेरे जाते ही ढह गया।

आज इतने सालों बाद जब फिर तुझे देखा,
दिल फिर उसी जगह जा के गिर पड़ा,
जहाँ उस रोज़ मैं था खड़ा,
तब लफ्ज़ नहीं थे तो तुझे रोक न पाया,
आज लफ्ज़ हैं, बेशुमार हैं, पर तू नहीं,
दिल मेरा तब भी चुप था, अब भी सब सह गया।

तू मोहताज नहीं…

तू किसी तारीफ की मोहताज नहीं,
तू मल्लिका है,
भले तेरे सिर पे ताज नहीं।

तेरा जमाल छिपा रहे दुनिया से,
ऐसा कोई पर्दा, कोई रिवाज नहीं।

तेरे हुस्न से टक्कर हो बराबर की,
यहाँ हसीन ऐसा कोई आज नहीं।

यहाँ से वहाँ तक कि कतार में देख ले,
कौन सा ऐसा दिल है जिसमें तेरा राज नहीं।

जो बात रखनी है खुल के बोल,
मेरे दिल की मेज़ पर दराज नहीं।

इज़हार-ए-इश्क़…

इतनी लंबी ग़ज़लें लिख डाली,
ये पन्ने भर भर के नज़्में,
ये शेरों के पुलिंदे लगे हुए,
बस इतना ही तो कहना था कि चाहते हो मुझे।
घर को जाते हुए उस सुनसान रास्ते पर,
चलते हुए मेरा हाथ छू लेते,
काफी होता उतना ही मेरे समझने के लिए।
या फिर मुझे गले लगा लेते,
जब उस शाम बारिश के दौरान,
बिजली कड़की थी, और सहम गई थी मैं।
या फिर बस सामने आ कर,
इज़हार कर देते अपनी मोहब्बत का,
जवाब तो सवाल से पहले ही,
तुमने मेरी आँखों मे पढ़ लिया था न।