क्या बात है…

माना तू ख़फ़ा है मुझसे,
पर मेरी नज़्मों से नाराज़गी कैसी,
इन्होंने तो नहीं तोड़ा दिल तेरा,
फिर इन पर तेरी बेरुखी की बेचारगी कैसी।

इनमें ही मेरा इश्क़ बसता,
इनमें ही तेरा अक्स दिखता,
हाँ, हो सकता है दिखे होंगे कभी साथ मेरे,
पर होते हैं ये अक्सर पास तेरे।

इनसे तो तूने घंटों बातें की हैं,
इनके जरिए मुझसे जाने कितनी मुलाक़ातें की हैं,
इन्हीं के सजदों में कभी तेरे आँसू बहे थे,
इन्हीं की पनाहों में छिपे तेरे कहकहे थे।

इन्हीं में तेरे हर मिज़ाज को मैंने पिरोया है,
इन्हीं ने अकेले में तेरे ज़ख्मों को भी धोया है,
इन नज़्मों के ख़ुमार में कितनी ही शब ढली,
इन्ही की मखमली चादर में कितनी सहर खिली।

इनपे तेरा हक़, तेरा ही ज़ोर रहेगा,
तेरे होने से बोल उठता था हर लफ्ज़,
तेरे बिन शायर भी क्या और कहेगा,
इनका वजूद है तब ही तक,
जब तक तू साथ है,
वार्ना मरे हुए शेरों पे कौन कहता है,
“क्या बात है”।

ज़ायका सुर्ख रंग का…

गर चे वाक़िफ़ है हर दास्ताँ-ए-मोहब्बत से,
ऐ साक़ी, ज़ायका मुझे सुर्ख़ रंग का बता।
हँसाना, रुलाना या रुसवा कर जाना,
क्या है मोहब्बत, मुझे भी सिखा।
तेरी नज़र से नहीं परे इन दो जहाँ के सच,
जन्नत की हक़ीक़त, जहन्नुम की हूरें दिखा।
सुना है सिखाता है तू सभी को इश्क़ के गुर,
मुझको भी ज़रा ख़ुदगर्ज़ी के नुस्ख़े सिखा।
टूटते देखे हैं मैंने सितारे तेरी ठोकरों पे,
कुछ ऐसी ही मोहब्बत मुझसे भी जता।
बहुत जी लिए ख़ुश फ़हमियों से घिर कर,
अब कुछ दर्द मुझे दे, कुछ ख़ुद को सता।
कई होंगे यक़ीनन आस पास तेरे,
कुछ वक़्त ज़रा ख़ुद के साथ बिता।
मुलाक़ातें कर ले कुछ रक़ीबों से भी,
बज़्म में शामिल कर, दूरियाँ मिटा।

अलग बात है…

आँखें उनकी ढूंढती नहीं अब भीड़ में आँखें मेरी,
कभी सुकून-ए-दिल था दीद मेरा भी, अलग बात है।

अब और नहीं मुस्कुराते वो देख कर मुझे,
अक्सर पहले याद मेरी हँसा देती थी उन्हें, अलग बात है।

कहाँ आना होता है मेरी गली में उनका आजकल,
भूल जाने के बहाने ही मिल जाया करते थे पहले, अलग बात है।

नज़्में मेरी पढ़ पढ़ कर रातें गुज़रती थी उनकी,
अब रक़ीबों की महफिलों में मदहोश रहते हैं, अलग बात है।

छुप कर मुझे देखना तो दस्तूर सा था उनका,
सामने से गुजरते हुए भी मुँह फेर लेते हैं अब, अलग बात है।

वादा तो था ज़िन्दगी भर साथ निभाने का,
दो कदम चल कर भूल गए जो, अलग बात है।

चलते रहने दो…

न तुमसे बातें साफ कही जाएंगी,
न मुझसे हालात नुमाया होंगे,
इल्ज़ाम मैं ले लेता हूँ तुम्हारे भी,
बेकार ही लफ्ज़ तुम्हारे ज़ाया होंगे।

कौन सा तुम्हें कोई फर्क ही पड़ जाएगा,
खून हो या आँसू मेरे, बहने दो,
न बस में कुछ मेरे है ना तुम्हारे,
जैसा चल रहा है, चलते रहने दो।

उसका ख़याल…

उसके जिस्म को पा जाने की तमन्ना कभी न थी,
पर उसकी रूह को छू लेने का ज़रूर ख़याल रहा।

मेरे ज़ेहन में उसका अक्स जाने कब से है काबिज़,
क्या मैं भी हूँ उसकी आँखों में, ये सवाल रहा।

वो आएगी महफ़िल में यक़ीन था, देर से ही सही,
फिर भी उससे मिलने तलक ये दिल बेहाल रहा।

छू कर उसे जल गए उसके कई दीवाने-परवाने,
उसकी पनाह से दूर रह कर जीने का मुझको मलाल रहा।

दिन फिर गुज़र गया उसके दीद के इंतज़ार में,
खुद से अकेले में उसकी बातों का सिलसिला बहरहाल रहा।

उसने नज़र की थी मुझपर बस पल भर के लिए,
ता उम्र ख़ुशियों से मैं लेकिन मालामाल रहा।

दुनिया चल रही है…

साँसे थमी हैं, उनकी कमी खल रही है,
बाकी दुनिया जैसी थी, वैसी ही चल रही है।

सब ठीक है यूँ तो, पर ये क्या,
उन्होंने मुस्कुराया, धड़कन बहल रही है।

मैं अब भी वही हूँ, नियत का अपनी पक्का,
फिर क्यों उन्हें देख आज रूह पिघल रही है?

बहुत पी ली उनके नाम पर, अब बस भी कर यार,
लड़खड़ाती तेरी चाल अब बहुत सम्हल रही है।

इंतेज़ार अब बेसब्र हो चला है, बा-मुश्किल होगा,
देखो अब तो ये शमा भी रंग बदल रही है।

ऐसे कैसे ठंडी पड जाएगी आग उनके दिल की,
जब तलक उनकी लगाई आग यहाँ जल रही है।

थी उम्मीद, पर अब नहीं, उन्हें गले लगाने की,
जैसे दिन-ब-दिन उनसे मुलाकात की तारीख टल रही है।

बेहिसाब सितम उनके, और बेचैन जान हमारी,
उनकी शाम सुकून में भला कैसे ढल रही है।

गले से लगा कर समां लूँ खुद में उनको,
ऐसी भी तमन्ना अब इस दिल में पल रही है।

मैंने तो अपनी जान को जाते हुए देखा है,
क्या मुझे जाता देख उनकी जान भी हथेली से फिसल रही है?

तेरा इश्क़…

ये अल्फ़ाज़ों का सौदा मुस्कान के साथ,
वो अपनों सा सलीखा मेहमान के साथ,
मुझे अपने नज़दीक रखना गुमान के साथ,
ऐ साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

कभी मेरी पनाहों में तेरा गुम हो जाना,
कभी तेरा मेरे मुझसे नज़दीक आना,
इक पल सब याद, अगले पल भूल जाना,
ऐ साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

कभी चोट मुझपे मुसलसल तेरी,
कभी फिर बेहिसाब मोहब्बत तेरी,
कभी सिर्फ़ दीदार की इजाज़त तेरी,
ए साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

कभी तेरी हर महफ़िल की जान मैं,
तेरा ज़मीन-ओ-आसमान मैं,
तेरा दीन धर्म ईमान मैं,
कभी अजनबी अनजान मैं,
ऐ साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

तन्हाई का कभी तेरे इलाज हूँ,
कभी तेरी ज़िंदगी का साज़ हूँ,
कभी तो मेरा वजूद नहीं,
कभी तेरा हुस्न तेरा मिज़ाज हुँ,
ए साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

तेरा इश्क़ मेरा फ़ितूर है,
तेरी रुसवाई भी मंज़ूर है,
तेरी मुस्कान मैं वजह नहीं,
तू नाराज़ मेरा क़ुसूर है,
ऐ साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

सहर तुझसे, तेरी ही हर शाम,
तू ही बक्श देता है कभी ये जान,
तेरे ही दर पे सजदा सलाम,
तेरे ही लबों से ज़हर का जाम,
ऐ साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।