तू मोहताज नहीं…

तू किसी तारीफ की मोहताज नहीं,
तू मल्लिका है,
भले तेरे सिर पे ताज नहीं।

तेरा जमाल छिपा रहे दुनिया से,
ऐसा कोई पर्दा, कोई रिवाज नहीं।

तेरे हुस्न से टक्कर हो बराबर की,
यहाँ हसीन ऐसा कोई आज नहीं।

यहाँ से वहाँ तक कि कतार में देख ले,
कौन सा ऐसा दिल है जिसमें तेरा राज नहीं।

जो बात रखनी है खुल के बोल,
मेरे दिल की मेज़ पर दराज नहीं।

इज़हार-ए-इश्क़…

इतनी लंबी ग़ज़लें लिख डाली,
ये पन्ने भर भर के नज़्में,
ये शेरों के पुलिंदे लगे हुए,
बस इतना ही तो कहना था कि चाहते हो मुझे।
घर को जाते हुए उस सुनसान रास्ते पर,
चलते हुए मेरा हाथ छू लेते,
काफी होता उतना ही मेरे समझने के लिए।
या फिर मुझे गले लगा लेते,
जब उस शाम बारिश के दौरान,
बिजली कड़की थी, और सहम गई थी मैं।
या फिर बस सामने आ कर,
इज़हार कर देते अपनी मोहब्बत का,
जवाब तो सवाल से पहले ही,
तुमने मेरी आँखों मे पढ़ लिया था न।

एहसान फरामोश…

मैंने चुन चुन के उन्हीं का नाम उछाला है,
जिनके कपड़े सफेद और दिल काला है।

तुम कहते हो आएगी सहर इक रोज़ ज़रूर,
मुझे भी ज़रा दिखाओ किधर को उजाला है।

एक पल अर्श पर, अगले ही पल फर्श पर,
इस जग का रवैया ही निराला है।

इस अहल-ए-जहाँ से क्या उम्मीद रखूँ ईमानदारी की,
जिसने मीरा की भक्ति में भी खोट निकाला है।

बात निकाल दूँ अभी गर मैं, बिखर जाएंगे कई,
न जाने कितनों की दुनिया को लफ़्ज़ों में अपने सम्हाला है।

तुम सामने न आ जाना, पहचान लूंगा तुम्हे,
तुम क्या जानो, ये मंज़र किस कदर अब तक टाला है।

लड़खड़ाऊंगा मैं तो सम्हालेंगे कई हाथ मुझे,
क्या खूब अब तक ज़हन में गलतफहमी को मैंने पाला है।

और तो किसी से उम्मीद न थी मुझे तेरे सिवा, ए ख़ुदा,
अब छोड़, कहने को न बचा तुझसे भी अब कोई नाला है।

उस तक पहुँचे…

कोई तो दास्तान इन्तेहाँ तक पहुँचे,
तेरे बिन कौन जाने कौन कहाँ तक पहुँचे।

मैं बुलाता हूँ तुझे मिलने यहाँ मुसलसल,
ये तमन्ना मुकम्मल जाने किस जहान तक पहुँचे।

दर्द, इश्क़, आंसू, मुस्कान, बहुत कुछ है,
फरियादी कोई लेकिन पहले दुकान तक पहुँचे।

मेरे हँसने की आवाज़ें सुनाई देती हैं तुझे अक्सर,
कभी ये सदा भी तुझ मेहरबान तक पहुँचे।

सुबह ही करवा दी थी खबर उसे जनाज़े की,
शायद ही वो घर पर शाम तक पहुँचे।

पहुँच से दूर बहुत है मेरी वो अब,
कम से कम अब हाथ मेरा मेरे जाम तक पहुँचे।

आखरी खत…

वो उनका आखरी ख़त भी आज खो गया,
दूर तो होना ही था उन्हीं की तरह, सो गया।

डरता हूँ कि कहीं उनसे भूले से मुलाक़ात न हो,
क्या पता पहचाने ही न, सामने उनके जो गया।

नाम उनका आया जब महफ़िल में मेरी आज,
होंठ तो मुस्कुराए, दिल तो बस रो गया।

क्यों इल्ज़ाम आए मुझपर दिल लगाने का उनसे,
उनका होकर रह गया, रूबरू उनके जो गया।

रुस्वा मुझे किया कुछ इस सलीक़े से,
खुद तो वो गया, हर याद धो गया।

अब तो बस मिलना मुझसे शायरी में होता है,
बात पर होती नहीं, दूर इस कदर वो गया।

छुट्टी…

इक इक कर सामान कम होता चला गया,
पहले बहु, फिर बेटा चला गया।

अब फिर बस हम दो ही घर में अकेले बचे,
अगली बार लंबी छुट्टी आऊंगा, कहता चला गया।

अब फिर वही रूखी सी सुबह होगी,
गुम से बेमौसम बरसात की तरह होगी।

न हमें तेरा चेहरा देखने का मौका होगा,
न तेरे साथ बैठने का कोई तरीका होगा।

अब तुझसे बातें न होंगी अखबार की,
बुराई अब किससे करूँगा भ्रष्ट सरकार की।

नाश्ता न करने का इक बहाना मिल जाएगा,
दिन का खाना खाते हुए कौन सा चेहरा खिल जाएगा।

शाम की सब्ज़ी अब वैसी ज़ायकेदार न होगी,
रोटी की मांग एक के बाद दूसरी की बार बार न होगी।

अब तो ये बाग भी यूँ ही बेज़ार रहेगा,
अब इसे भी मेरी तरह तेरी अगली छुट्टी का इंतज़ार रहेगा।

छूने दे…

छूने दे किसी बहाने से,
या दूर कहीं ज़माने से,
किसी की नज़र में हम न आएं,
मेरी नियत पे कहीं किसी का शक न जाए।

जानता हूँ कि पसंद है तुझे,
तेज़ दौड़ना और हवाओं में उड़ना,
कुछ इत्मिनान रखना ख्वाइशों पे लेकिन,
तेरा यार कहीं आधे में थक न जाए।