दुनिया चल रही है…

साँसे थमी हैं, उनकी कमी खल रही है,
बाकी दुनिया जैसी थी, वैसी ही चल रही है।

सब ठीक है यूँ तो, पर ये क्या,
उन्होंने मुस्कुराया, धड़कन बहल रही है।

मैं अब भी वही हूँ, नियत का अपनी पक्का,
फिर क्यों उन्हें देख आज रूह पिघल रही है?

बहुत पी ली उनके नाम पर, अब बस भी कर यार,
लड़खड़ाती तेरी चाल अब बहुत सम्हल रही है।

इंतेज़ार अब बेसब्र हो चला है, बा-मुश्किल होगा,
देखो अब तो ये शमा भी रंग बदल रही है।

ऐसे कैसे ठंडी पड जाएगी आग उनके दिल की,
जब तलक उनकी लगाई आग यहाँ जल रही है।

थी उम्मीद, पर अब नहीं, उन्हें गले लगाने की,
जैसे दिन-ब-दिन उनसे मुलाकात की तारीख टल रही है।

बेहिसाब सितम उनके, और बेचैन जान हमारी,
उनकी शाम सुकून में भला कैसे ढल रही है।

गले से लगा कर समां लूँ खुद में उनको,
ऐसी भी तमन्ना अब इस दिल में पल रही है।

मैंने तो अपनी जान को जाते हुए देखा है,
क्या मुझे जाता देख उनकी जान भी हथेली से फिसल रही है?

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