अलग बात है…

आँखें उनकी ढूंढती नहीं अब भीड़ में आँखें मेरी,
कभी सुकून-ए-दिल था दीद मेरा भी, अलग बात है।

अब और नहीं मुस्कुराते वो देख कर मुझे,
अक्सर पहले याद मेरी हँसा देती थी उन्हें, अलग बात है।

कहाँ आना होता है मेरी गली में उनका आजकल,
भूल जाने के बहाने ही मिल जाया करते थे पहले, अलग बात है।

नज़्में मेरी पढ़ पढ़ कर रातें गुज़रती थी उनकी,
अब रक़ीबों की महफिलों में मदहोश रहते हैं, अलग बात है।

छुप कर मुझे देखना तो दस्तूर सा था उनका,
सामने से गुजरते हुए भी मुँह फेर लेते हैं अब, अलग बात है।

वादा तो था ज़िन्दगी भर साथ निभाने का,
दो कदम चल कर भूल गए जो, अलग बात है।

8 thoughts on “अलग बात है…

  1. क्या कहें।दिल को गुदगुदाती और रुलाती पंक्तियाँ।

    अब और नहीं मुस्कुराते वो देख कर मुझे,
    अक्सर पहले याद मेरी हँसा देती थी उन्हें, अलग बात है।

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  2. Bahut hi umda👌 spclly these lines
    ” नज़्में मेरी पढ़ पढ़ कर रातें गुज़रती थी उनकी,
    अब रक़ीबों की महफिलों में मदहोश रहते हैं, अलग बात है।”

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