उस तक पहुँचे…

कोई तो दास्तान इन्तेहाँ तक पहुँचे,
तेरे बिन कौन जाने कौन कहाँ तक पहुँचे।

मैं बुलाता हूँ तुझे मिलने यहाँ मुसलसल,
ये तमन्ना मुकम्मल जाने किस जहान तक पहुँचे।

दर्द, इश्क़, आंसू, मुस्कान, बहुत कुछ है,
फरियादी कोई लेकिन पहले दुकान तक पहुँचे।

मेरे हँसने की आवाज़ें सुनाई देती हैं तुझे अक्सर,
कभी ये सदा भी तुझ मेहरबान तक पहुँचे।

सुबह ही करवा दी थी खबर उसे जनाज़े की,
शायद ही वो घर पर शाम तक पहुँचे।

पहुँच से दूर बहुत है मेरी वो अब,
कम से कम अब हाथ मेरा मेरे जाम तक पहुँचे।

आखरी खत…

वो उनका आखरी ख़त भी आज खो गया,
दूर तो होना ही था उन्हीं की तरह, सो गया।

डरता हूँ कि कहीं उनसे भूले से मुलाक़ात न हो,
क्या पता पहचाने ही न, सामने उनके जो गया।

नाम उनका आया जब महफ़िल में मेरी आज,
होंठ तो मुस्कुराए, दिल तो बस रो गया।

क्यों इल्ज़ाम आए मुझपर दिल लगाने का उनसे,
उनका होकर रह गया, रूबरू उनके जो गया।

रुस्वा मुझे किया कुछ इस सलीक़े से,
खुद तो वो गया, हर याद धो गया।

अब तो बस मिलना मुझसे शायरी में होता है,
बात पर होती नहीं, दूर इस कदर वो गया।

छुट्टी…

इक इक कर सामान कम होता चला गया,
पहले बहु, फिर बेटा चला गया।

अब फिर बस हम दो ही घर में अकेले बचे,
अगली बार लंबी छुट्टी आऊंगा, कहता चला गया।

अब फिर वही रूखी सी सुबह होगी,
गुम से बेमौसम बरसात की तरह होगी।

न हमें तेरा चेहरा देखने का मौका होगा,
न तेरे साथ बैठने का कोई तरीका होगा।

अब तुझसे बातें न होंगी अखबार की,
बुराई अब किससे करूँगा भ्रष्ट सरकार की।

नाश्ता न करने का इक बहाना मिल जाएगा,
दिन का खाना खाते हुए कौन सा चेहरा खिल जाएगा।

शाम की सब्ज़ी अब वैसी ज़ायकेदार न होगी,
रोटी की मांग एक के बाद दूसरी की बार बार न होगी।

अब तो ये बाग भी यूँ ही बेज़ार रहेगा,
अब इसे भी मेरी तरह तेरी अगली छुट्टी का इंतज़ार रहेगा।

छूने दे…

छूने दे किसी बहाने से,
या दूर कहीं ज़माने से,
किसी की नज़र में हम न आएं,
मेरी नियत पे कहीं किसी का शक न जाए।

जानता हूँ कि पसंद है तुझे,
तेज़ दौड़ना और हवाओं में उड़ना,
कुछ इत्मिनान रखना ख्वाइशों पे लेकिन,
तेरा यार कहीं आधे में थक न जाए।

दास्तान-ए-मुलाक़ात…

न हुआ उसका तो तू क्या तू हुआ,
कैसा तेरा इश्क़ जो उसके हाथों न बेआबरू हुआ।

किस्से मुक़म्मल तो कई होंगे पास तेरे,
बता कोई वाकिया जो उसके नाम से शुरू हुआ।

दिन का सुकून गया, रातों की तसल्ली गयी,
वाह रे, तेरा तो इश्क़ ही तेरा उदू हुआ।

कयामत हुई या सैलाब आया, या दर खुदा का खुला,
भला मंज़र कैसा था, जब तू उसके रूबरू हुआ।

लफ़्ज़ों को अपने न ज़ाया कर, सुन रहा हूँ,
तेरी आँखों से दास्ताँ, कि यूँ हुआ औऱ यूँ हुआ।

क्या बात है…

माना तू ख़फ़ा है मुझसे,
पर मेरी नज़्मों से नाराज़गी कैसी,
इन्होंने तो नहीं तोड़ा दिल तेरा,
फिर इन पर तेरी बेरुखी की बेचारगी कैसी।

इनमें ही मेरा इश्क़ बसता,
इनमें ही तेरा अक्स दिखता,
हाँ, हो सकता है दिखे होंगे कभी साथ मेरे,
पर होते हैं ये अक्सर पास तेरे।

इनसे तो तूने घंटों बातें की हैं,
इनके जरिए मुझसे जाने कितनी मुलाक़ातें की हैं,
इन्हीं के सजदों में कभी तेरे आँसू बहे थे,
इन्हीं की पनाहों में छिपे तेरे कहकहे थे।

इन्हीं में तेरे हर मिज़ाज को मैंने पिरोया है,
इन्हीं ने अकेले में तेरे ज़ख्मों को भी धोया है,
इन नज़्मों के ख़ुमार में कितनी ही शब ढली,
इन्ही की मखमली चादर में कितनी सहर खिली।

इनपे तेरा हक़, तेरा ही ज़ोर रहेगा,
तेरे होने से बोल उठता था हर लफ्ज़,
तेरे बिन शायर भी क्या और कहेगा,
इनका वजूद है तब ही तक,
जब तक तू साथ है,
वार्ना मरे हुए शेरों पे कौन कहता है,
“क्या बात है”।

ज़ायका सुर्ख रंग का…

गर चे वाक़िफ़ है हर दास्ताँ-ए-मोहब्बत से,
ऐ साक़ी, ज़ायका मुझे सुर्ख़ रंग का बता।

हँसाना, रुलाना या रुसवा कर जाना,
क्या है मोहब्बत, मुझे भी सिखा।

तेरी नज़र से नहीं परे इन दो जहाँ के सच,
जन्नत की हक़ीक़त, जहन्नुम की हूरें दिखा।

सुना है सिखाता है तू सभी को इश्क़ के गुर,
मुझको भी ज़रा ख़ुदगर्ज़ी के नुस्ख़े सिखा।

टूटते देखे हैं मैंने सितारे तेरी ठोकरों पे,
कुछ ऐसी ही मोहब्बत मुझसे भी जता।

बहुत जी लिए ख़ुश फ़हमियों से घिर कर,
अब कुछ दर्द मुझे दे, कुछ ख़ुद को सता।

कई होंगे यक़ीनन आस पास तेरे,
कुछ वक़्त ज़रा ख़ुद के साथ बिता।

मुलाक़ातें कर ले कुछ रक़ीबों से भी,
बज़्म में शामिल कर, दूरियाँ मिटा।