चलते रहने दो…

न तुमसे बातें साफ कही जाएंगी,
न मुझसे हालात नुमाया होंगे,
इल्ज़ाम मैं ले लेता हूँ तुम्हारे भी,
बेकार ही लफ्ज़ तुम्हारे ज़ाया होंगे।

कौन सा तुम्हें कोई फर्क ही पड़ जाएगा,
खून हो या आँसू मेरे, बहने दो,
न बस में कुछ मेरे है ना तुम्हारे,
जैसा चल रहा है, चलते रहने दो।

उसका ख़याल…

उसके जिस्म को पा जाने की तमन्ना कभी न थी,
पर उसकी रूह को छू लेने का ज़रूर ख़याल रहा।

मेरे ज़ेहन में उसका अक्स जाने कब से है काबिज़,
क्या मैं भी हूँ उसकी आँखों में, ये सवाल रहा।

वो आएगी महफ़िल में यक़ीन था, देर से ही सही,
फिर भी उससे मिलने तलक ये दिल बेहाल रहा।

छू कर उसे जल गए उसके कई दीवाने-परवाने,
उसकी पनाह से दूर रह कर जीने का मुझको मलाल रहा।

दिन फिर गुज़र गया उसके दीद के इंतज़ार में,
खुद से अकेले में उसकी बातों का सिलसिला बहरहाल रहा।

उसने नज़र की थी मुझपर बस पल भर के लिए,
ता उम्र ख़ुशियों से मैं लेकिन मालामाल रहा।

दुनिया चल रही है…

साँसे थमी हैं, उनकी कमी खल रही है,
बाकी दुनिया जैसी थी, वैसी ही चल रही है।

सब ठीक है यूँ तो, पर ये क्या,
उन्होंने मुस्कुराया, धड़कन बहल रही है।

मैं अब भी वही हूँ, नियत का अपनी पक्का,
फिर क्यों उन्हें देख आज रूह पिघल रही है?

बहुत पी ली उनके नाम पर, अब बस भी कर यार,
लड़खड़ाती तेरी चाल अब बहुत सम्हल रही है।

इंतेज़ार अब बेसब्र हो चला है, बा-मुश्किल होगा,
देखो अब तो ये शमा भी रंग बदल रही है।

ऐसे कैसे ठंडी पड जाएगी आग उनके दिल की,
जब तलक उनकी लगाई आग यहाँ जल रही है।

थी उम्मीद, पर अब नहीं, उन्हें गले लगाने की,
जैसे दिन-ब-दिन उनसे मुलाकात की तारीख टल रही है।

बेहिसाब सितम उनके, और बेचैन जान हमारी,
उनकी शाम सुकून में भला कैसे ढल रही है।

गले से लगा कर समां लूँ खुद में उनको,
ऐसी भी तमन्ना अब इस दिल में पल रही है।

मैंने तो अपनी जान को जाते हुए देखा है,
क्या मुझे जाता देख उनकी जान भी हथेली से फिसल रही है?

तेरा इश्क़…

ये अल्फ़ाज़ों का सौदा मुस्कान के साथ,
वो अपनों सा सलीखा मेहमान के साथ,
मुझे अपने नज़दीक रखना गुमान के साथ,
ऐ साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

कभी मेरी पनाहों में तेरा गुम हो जाना,
कभी तेरा मेरे मुझसे नज़दीक आना,
इक पल सब याद, अगले पल भूल जाना,
ऐ साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

कभी चोट मुझपे मुसलसल तेरी,
कभी फिर बेहिसाब मोहब्बत तेरी,
कभी सिर्फ़ दीदार की इजाज़त तेरी,
ए साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

कभी तेरी हर महफ़िल की जान मैं,
तेरा ज़मीन-ओ-आसमान मैं,
तेरा दीन धर्म ईमान मैं,
कभी अजनबी अनजान मैं,
ऐ साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

तन्हाई का कभी तेरे इलाज हूँ,
कभी तेरी ज़िंदगी का साज़ हूँ,
कभी तो मेरा वजूद नहीं,
कभी तेरा हुस्न तेरा मिज़ाज हुँ,
ए साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

तेरा इश्क़ मेरा फ़ितूर है,
तेरी रुसवाई भी मंज़ूर है,
तेरी मुस्कान मैं वजह नहीं,
तू नाराज़ मेरा क़ुसूर है,
ऐ साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

सहर तुझसे, तेरी ही हर शाम,
तू ही बक्श देता है कभी ये जान,
तेरे ही दर पे सजदा सलाम,
तेरे ही लबों से ज़हर का जाम,
ऐ साक़ी, तेरा इश्क़ समझना आसान नहीं।

तू मेरी ज़िंदगी में…

तेरी सूरत अनजाने में ही सही,
पर आँखो में बसी है,
तुझसे दूरी मेरी साँसों में कमी है,
मेरी हर याद में तेरी ही छवि है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

तुझपे हक़ है मेरा,
मुझमें तू समाई है,
ना फिर जुदा हो सके,
खुदा ने ऐसी कुछ बनाई है,
तू नहीं आसपास जो,
आँखो में मेरे नमी है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

सुकून दिल को तेरे नाम से,
बेचैन जान मेरी फुरकत-ए-शाम से,
तेरी बातें फिर ख़ाली जाम से,
तुझसे मुलाक़ात बहाने या काम से,
इश्क़-ओ-जंग में सब सही है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

तू भी तो बातों के बीच रूकती होगी,
रास्तों में रुक कर मेरी राह तकती होगी,
तेरी भी राह मेरी गलियों में भटकती होगी,
मुझे देख तेरी भी चुन्नी सरकती होगी,
सच कह, मेरी सदा तूने सुनी है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

तू मेरी ज़िंदगी में…

तेरी सूरत अनजाने में ही सही,
पर आँखो में बसी है,
तुझसे दूरी मेरी साँसों में कमी है,
मेरी हर याद में तेरी ही छवि है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

तुझपे हक़ है मेरा,
मुझमें तू समाई है,
ना फिर जुदा हो सके,
खुदा ने ऐसी कुछ बनाई है,
तू नहीं आसपास जो,
आँखो में मेरे नमी है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

सुकून दिल को तेरे नाम से,
बेचैन जान मेरी फुरकत-ए-शाम से,
तेरी बातें फिर ख़ाली जाम से,
तुझसे मुलाक़ात बहाने या काम से,
इश्क़-ओ-जंग में सब सही है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

तू भी तो बातों के बीच रूकती होगी,
रास्तों में रुक कर मेरी राह तकती होगी,
तेरी भी राह मेरी गलियों में भटकती होगी,
मुझे देख तेरी भी चुन्नी सरकती होगी,
सच कह, मेरी सदा तूने सुनी है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

मिलने की तारीख…

उनके ज़हन को बेचैनी का ख्याल दे,
ऐ दिल, उनसे मिलने की तारीख एक दिन और टाल दे।

चलते रहने दे इशारों के ये सिलसिले यूँ ही,
कुछ और रातें उन्हें सौगात-ए-बेहाल दे।

आजकल मिलते भी हैं तो कुछ कहते नहीं,
मेरे रक़ीब को बोल, उन्हें कुछ सवाल दे।

तो क्या हुआ जो उनका यार है साथ उनके,
किसने मना किया कि वो खैरात-ए-जमाल दे|

वो यूँ ही मिल जाए हर रोज़ तो क्या ही मज़ा,
गुज़ारिश-ए-किस्मत, गैरमौजूदगी का उनकी मलाल दे|

उनसे आगे जी कर क्या ही करना है मुझे,
बस उनकी दीद होती रहे, इतने साल दे|