छूने दे…

छूने दे किसी बहाने से,
या दूर कहीं ज़माने से,
किसी की नज़र में हम न आएं,
मेरी नियत पे कहीं किसी का शक न जाए।

जानता हूँ कि पसंद है तुझे,
तेज़ दौड़ना और हवाओं में उड़ना,
कुछ इत्मिनान रखना ख्वाइशों पे लेकिन,
तेरा यार कहीं आधे में थक न जाए।

दास्तान-ए-मुलाक़ात…

न हुआ उसका तो तू क्या तू हुआ,
कैसा तेरा इश्क़ जो उसके हाथों न बेआबरू हुआ।

किस्से मुक़म्मल तो कई होंगे पास तेरे,
बता कोई वाकिया जो उसके नाम से शुरू हुआ।

दिन का सुकून गया, रातों की तसल्ली गयी,
वाह रे, तेरा तो इश्क़ ही तेरा उदू हुआ।

कयामत हुई या सैलाब आया, या दर खुदा का खुला,
भला मंज़र कैसा था, जब तू उसके रूबरू हुआ।

लफ़्ज़ों को अपने न ज़ाया कर, सुन रहा हूँ,
तेरी आँखों से दास्ताँ, कि यूँ हुआ औऱ यूँ हुआ।

क्या बात है…

माना तू ख़फ़ा है मुझसे,
पर मेरी नज़्मों से नाराज़गी कैसी,
इन्होंने तो नहीं तोड़ा दिल तेरा,
फिर इन पर तेरी बेरुखी की बेचारगी कैसी।

इनमें ही मेरा इश्क़ बसता,
इनमें ही तेरा अक्स दिखता,
हाँ, हो सकता है दिखे होंगे कभी साथ मेरे,
पर होते हैं ये अक्सर पास तेरे।

इनसे तो तूने घंटों बातें की हैं,
इनके जरिए मुझसे जाने कितनी मुलाक़ातें की हैं,
इन्हीं के सजदों में कभी तेरे आँसू बहे थे,
इन्हीं की पनाहों में छिपे तेरे कहकहे थे।

इन्हीं में तेरे हर मिज़ाज को मैंने पिरोया है,
इन्हीं ने अकेले में तेरे ज़ख्मों को भी धोया है,
इन नज़्मों के ख़ुमार में कितनी ही शब ढली,
इन्ही की मखमली चादर में कितनी सहर खिली।

इनपे तेरा हक़, तेरा ही ज़ोर रहेगा,
तेरे होने से बोल उठता था हर लफ्ज़,
तेरे बिन शायर भी क्या और कहेगा,
इनका वजूद है तब ही तक,
जब तक तू साथ है,
वार्ना मरे हुए शेरों पे कौन कहता है,
“क्या बात है”।

ज़ायका सुर्ख रंग का…

गर चे वाक़िफ़ है हर दास्ताँ-ए-मोहब्बत से,
ऐ साक़ी, ज़ायका मुझे सुर्ख़ रंग का बता।

हँसाना, रुलाना या रुसवा कर जाना,
क्या है मोहब्बत, मुझे भी सिखा।

तेरी नज़र से नहीं परे इन दो जहाँ के सच,
जन्नत की हक़ीक़त, जहन्नुम की हूरें दिखा।

सुना है सिखाता है तू सभी को इश्क़ के गुर,
मुझको भी ज़रा ख़ुदगर्ज़ी के नुस्ख़े सिखा।

टूटते देखे हैं मैंने सितारे तेरी ठोकरों पे,
कुछ ऐसी ही मोहब्बत मुझसे भी जता।

बहुत जी लिए ख़ुश फ़हमियों से घिर कर,
अब कुछ दर्द मुझे दे, कुछ ख़ुद को सता।

कई होंगे यक़ीनन आस पास तेरे,
कुछ वक़्त ज़रा ख़ुद के साथ बिता।

मुलाक़ातें कर ले कुछ रक़ीबों से भी,
बज़्म में शामिल कर, दूरियाँ मिटा।

अलग बात है…

आँखें उनकी ढूंढती नहीं अब भीड़ में आँखें मेरी,
कभी सुकून-ए-दिल था दीद मेरा भी, अलग बात है।

अब और नहीं मुस्कुराते वो देख कर मुझे,
अक्सर पहले याद मेरी हँसा देती थी उन्हें, अलग बात है।

कहाँ आना होता है मेरी गली में उनका आजकल,
भूल जाने के बहाने ही मिल जाया करते थे पहले, अलग बात है।

नज़्में मेरी पढ़ पढ़ कर रातें गुज़रती थी उनकी,
अब रक़ीबों की महफिलों में मदहोश रहते हैं, अलग बात है।

छुप कर मुझे देखना तो दस्तूर सा था उनका,
सामने से गुजरते हुए भी मुँह फेर लेते हैं अब, अलग बात है।

वादा तो था ज़िन्दगी भर साथ निभाने का,
दो कदम चल कर भूल गए जो, अलग बात है।

चलते रहने दो…

न तुमसे बातें साफ कही जाएंगी,
न मुझसे हालात नुमाया होंगे,
इल्ज़ाम मैं ले लेता हूँ तुम्हारे भी,
बेकार ही लफ्ज़ तुम्हारे ज़ाया होंगे।

कौन सा तुम्हें कोई फर्क ही पड़ जाएगा,
खून हो या आँसू मेरे, बहने दो,
न बस में कुछ मेरे है ना तुम्हारे,
जैसा चल रहा है, चलते रहने दो।

उसका ख़याल…

उसके जिस्म को पा जाने की तमन्ना कभी न थी,
पर उसकी रूह को छू लेने का ज़रूर ख़याल रहा।

मेरे ज़ेहन में उसका अक्स जाने कब से है काबिज़,
क्या मैं भी हूँ उसकी आँखों में, ये सवाल रहा।

वो आएगी महफ़िल में यक़ीन था, देर से ही सही,
फिर भी उससे मिलने तलक ये दिल बेहाल रहा।

छू कर उसे जल गए उसके कई दीवाने-परवाने,
उसकी पनाह से दूर रह कर जीने का मुझको मलाल रहा।

दिन फिर गुज़र गया उसके दीद के इंतज़ार में,
खुद से अकेले में उसकी बातों का सिलसिला बहरहाल रहा।

उसने नज़र की थी मुझपर बस पल भर के लिए,
ता उम्र ख़ुशियों से मैं लेकिन मालामाल रहा।