तू मेरी ज़िंदगी में…

तेरी सूरत अनजाने में ही सही,
पर आँखो में बसी है,
तुझसे दूरी मेरी साँसों में कमी है,
मेरी हर याद में तेरी ही छवि है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

तुझपे हक़ है मेरा,
मुझमें तू समाई है,
ना फिर जुदा हो सके,
खुदा ने ऐसी कुछ बनाई है,
तू नहीं आसपास जो,
आँखो में मेरे नमी है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

सुकून दिल को तेरे नाम से,
बेचैन जान मेरी फुरकत-ए-शाम से,
तेरी बातें फिर ख़ाली जाम से,
तुझसे मुलाक़ात बहाने या काम से,
इश्क़-ओ-जंग में सब सही है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

तू भी तो बातों के बीच रूकती होगी,
रास्तों में रुक कर मेरी राह तकती होगी,
तेरी भी राह मेरी गलियों में भटकती होगी,
मुझे देख तेरी भी चुन्नी सरकती होगी,
सच कह, मेरी सदा तूने सुनी है,
तू मेरी ज़िंदगी में बस यूँ ही नहीं है।

मिलने की तारीख…

उनके ज़हन को बेचैनी का ख्याल दे,
ऐ दिल, उनसे मिलने की तारीख एक दिन और टाल दे।

चलते रहने दे इशारों के ये सिलसिले यूँ ही,
कुछ और रातें उन्हें सौगात-ए-बेहाल दे।

आजकल मिलते भी हैं तो कुछ कहते नहीं,
मेरे रक़ीब को बोल, उन्हें कुछ सवाल दे।

तो क्या हुआ जो उनका यार है साथ उनके,
किसने मना किया कि वो खैरात-ए-जमाल दे|

वो यूँ ही मिल जाए हर रोज़ तो क्या ही मज़ा,
गुज़ारिश-ए-किस्मत, गैरमौजूदगी का उनकी मलाल दे|

उनसे आगे जी कर क्या ही करना है मुझे,
बस उनकी दीद होती रहे, इतने साल दे|

मेरा माहताब…

इक पल मुट्ठी में था सब कुछ,
अगले पल रेत सा फिसल गया,
था शामिल मुझमें यूँ तो,
न जाने कब वो निकल गया।

कल तक था जो हमराह मेरा,
रस्ता उसका भी बदल गया,
दिल ही तो था, कोई खुदा नहीं,
उसने बहलाया, बहल गया।

इल्ज़ाम उसपे भी आए क्यों,
कोई उसपे दोष लगाए क्यों,
जब रोना ही है अंजाम पर,
आगाज़ में कोई हँसाए क्यों।

पास है वो, कोई दूर नहीं,
इतना भी मैं मजबूर नहीं,
दीदार को उसके जी ये करे,
और न हो वो, मंज़ूर नहीं।

फिर वो लम्हा भी आएगा,
वो मेरे गले लग जाएगा,
भिगो के मेरे दामन को,
वो मन का बोझ घटाएगा।

बस उस दिन के इंतज़ार में हूँ,
जब मेरे ख्यालों का हिसाब होगा,
तू रखना, ऐ रब, अपना चाँद वहीं,
मेरे पास तो मेरा माहताब होगा।

गुनाहगार हूँ मैं…

माना तेरे हर ज़ख्म का गुनाहगार हूँ मैं,
पर इक आखरी अलविदा का हकदार हूँ मैं।

इक दर्द मिला था मुझे, वास्ते नमूने,
उसी मुकम्मल अफ़साने का तलबगार हूँ मैं।

तेरी महक अब भी मुझसे वैसी ही आती है,
गैरमौजूदगी में तेरी, तेरे इश्क़ का इश्तिहार हूँ मैं।

कल तेरी आँखों का नूर था मैं भी,
आज तेरी रुसवाई से बेज़ार हूँ मैं।

तुझे अपने दिल से निकाल देने का फैसला तो कर दिया,
अपने ही दिल के हाथों पर लाचार हूँ मैं।

जाम भी खत्म न हुआ, और नाम तेरा भूल गया,
किस बेसलीके का बादा-ख्वार हूँ मैं।

मेरी बातों पर मेरा कोई इख़्तेयार नहीं,
खुद ही के ज़हन से फरार हूँ मैं।

अब मुझसे न आशिक़ी होगी, न मौसिकी, न शायरी,
क्यों रहते हो पास मेरे, निहायती बेकार हूँ मैं।

चल उसे मनाने चले…

ऐ दिल, चल उसे मनाने चले,
जिसके बिना एक पल जैसे ज़माने चले।

दो दिन की नाराज़गी काफी है उससे,
जिसके साथ जाने कबसे तेरे फ़साने चले।

वो इश्क़ भला फिर क्या इश्क़ हुआ कि,
यार मुँह फेरे, अलग दीवाने चले।

बात कर, बात यकीनन बढ़ेगी,
तन्हाई में क्या बात, किसको बताने चले?

रूठा हुआ है दिल यहाँ खुद ही से खुद का,
ऐसे में फिर कौन किसे हँसाने चले।

भला दूर रहकर उससे तू रह पाएगा कभी,
कहाँ तू, कहाँ तेरे तराने चले।

छोड़ अब अपनी शायरी, ये सब किसके लिए,
जब वो ही नहीं पास तेरे,
किसके दामन में तू आँसू बहाने चले???

ढूंढता रहा…

ता उम्र फकत एक ख़्वाब ढूंढता रहा,
हमसफर, ऐ ज़िन्दगी, तुझसे खराब ढूंढता रहा।

जाने कितनी ही महजबीन आई मेरे सामने,
और मैं आसमां में माहताब ढूढ़ता रहा।

अनगिनत ही मिलते रहे जाम मुझको इश्क़ के,
और मैं बदनसीब मयखानों में शराब ढूंढता रहा।

हर कतरा उसकी दीद का समंदर से कम न था,
और मैं गैरों के हुस्न के तालाब ढूंढता रहा।

सूरतें तूने तो ज़िन्दगी साफ ही दिखलाई थी,
मैं जाने फिर क्यों सूरतों पे नकाब ढूंढता रहा।

मुझपे अपनी इनायत तूने तो बेहिसाब की थी,
पर मैं तेरे एहसानों का हिसाब ढूंढता रहा।

बुलाती रही तू मुझे बेखुद होकर आगोश में,
मैं ज़माने की धूप में ताब ढूंढता रहा।

ये फ़साना भी एक सच्चाई है मेरी,
ज़िंदा रह कर भी ज़िन्दगी जनाब ढूंढता रहा।

आहिस्ता चल…

ए दिल, इतनी भी क्या जल्दी पड़ी है, आहिस्ता चल,
उम्र काटने को सारी उम्र पड़ी है, आहिस्ता चल।

यूं तो इल्म है मुझे उसके इरादों का,
ज़िन्दगी खंजर लिए आगे खड़ी है, आहिस्ता चल।

सामने अनजाने, पीछे अध-सुलझे सवाल,
किधर जाऊँ, मुश्किल बड़ी है, आहिस्ता चल।

मेरे ख़यालों में उसका ज़िक्र और उसका मेरे ख़यालों पे सवाल,
दरमियाँ कुछ तो गड़बड़ी है, आहिस्ता चल।

वाकिफ हूँ मैं भी मंज़िल-ए-आदम से,
सुस्ता लूँ कुछ देर, थकान बड़ी है, आहिस्ता चल।

मोड़ पे सुना है मेरे इंतेज़ार में हैं कई,
यकीनन उनके पास इल्ज़ामों की लड़ी है, आहिस्ता चल।

बस अब और नहीं चाह साक़ी-ए-कौसर की,
उसके इश्क़ की खुमारी अब तक चढ़ी है, आहिस्ता चल।